रोसेण महाधम्मो णसिज्ज तणं च अग्गिणा सव्वो ।
पावं च करिज्ज माहं बहुगंपि णरेण खमिदव्वं॥1432॥
धर्म नष्ट हो क्रोधाग्नि से यथा अग्नि से जलती घास ।
महापाप का बन्ध कराती अतः क्षमा करना धारण॥1432॥
अन्वयार्थ : जैसे अग्नि के द्वारा तृणादि सभी जलकर नष्ट हो जाते हैं, तैसे ही रोष/क्रोध के द्वारा महान धर्म का नाश हो जाता है और रोष से जीव के महापाप का बंध होता है । इसलिए सर्व प्रकार से क्षमा करना योग्य है ।

  सदासुखदासजी