पुव्वकदमज्झपावं पत्तं परदुखकरणजादं मे ।
रिणमोक्खो मे जादो मे अज्जत्ति य होदि खमिदव्वं॥1433॥
पर को दुःख देने से बाँधे, पाप कर्म मैंने पहले ।
उस ऋण से मैं मुक्त हुआ एेसा विचार कर क्षमा धरें॥1433॥
अन्वयार्थ : किसी का कुवचन सुनकर तथा मारण-ताडन किये जाने पर उत्तम/सज्जन पुरुष ऐसा चिंतवन करते हैं - मेरा पूर्व जन्मकृत पाप है । मैंने अन्य जीवोें को दु:ख दिया था, उससे उपार्जित पाप कर्म मेरे उदय में आया है, वह अपना फल देकर नाश हो जायेगा । जैसे कोई का ऋण/कर्ज देना हो और कर्ज चुका दे/कर्ज मुक्त हो जाये तो शांति हो जाती है । तैसे ही यदि पाप कर्म के उदय को क्रोधादि रहित समभावों पूर्वक सह लूँगा तो आगामी कर्म का बंध नहीं होगा और पूर्वकृत पापों की निर्जरा हो जायेगी । इसप्रकार विचार कर क्षमा करना ही योग्य है ।

  सदासुखदासजी