
पुव्वं सयमुवभुत्तं काले णाएण तेत्तियं दव्वं ।
को धारणीओ धणियस्स दिंतओ दूक्खिओ होज्ज॥1434॥
पहले तो अपराध किया था वही पाप फल अब भोगूँ ।
पहले कर्ज लिया धन भोगा उसे चुका क्यों दुख भोगूँ॥1434॥
अन्वयार्थ : पूर्व में आपने पापबंध के कारणभूत अन्य जीवों को कुवचन कहे थे, झूठा कलंक लगाया था, उसका फल उदय में आया है, यह तो न्याय ही है । अब इसके भोगने में विषाद/खेद नहीं करना, यह ही आत्महित है ।
सदासुखदासजी