इह य परत्त य लोए दोसे बहुए य आवहदि कोधो ।
इदि अप्पणो गणित्ता परिहरिदव्वो हवइ कोधो॥1435॥
इस भव एवं पर-भव में बहु दोष क्रोध उत्पन्न करे ।
यह विचार कर आत्म-हितैषी क्रोध भाव का त्याग करें॥1435॥
अन्वयार्थ : यह क्रोध इस लोक में तथा पर लोक में बहुत दोषों - दुखों को देने वाला है, अत: अपनी आराधना करके क्रोध कषाय को जीता जाता है । इस प्रकार क्रोधकृत परिणाम को जीतने के उपाय का वर्णन किया ।

  सदासुखदासजी