+ अब मानकृत परिणाम को जीतने की भावना कहते हैं - -
को एत्थ मज्झ माणो बहुसो णीचत्तणं पि पत्तस्स ।
उच्चते य अणिच्चे उवट्ठिदे चावि णीचत्ते॥1436॥
ज्ञानरूप कुल तप धन प्रभुता में ऊँचा हूँ तो भी क्या?
ऊँच नीचता तो अनित्य, इनमें कई बार हुआ नीचा॥1436॥
अन्वयार्थ : अनेकबार नीचकुल, नीच जाति पाई, अनेकबार कुरूप पाया, अज्ञानी हुआ, रंक हुआ, दीन हुआ, बलरहित हुआ । मैं अनंतबार नीचपने को प्राप्त हुआ हूँ । अब इस मनुष्य जन्म में क्या मान करना? अनंतकाल पर्यंत अनंत जन्मों में अपमानित हुआ हूँ, अब मान करना तो बडा लज्जाकारक है । यह विनाशीक उच्चपना प्राप्त होते ही उसका प्रतिपक्षी नीचपना समीप में ही जानना । इसलिए अभिमान छोडकर मार्दव भाव धारण करना योग्य है ।

  सदासुखदासजी