अधिगेसु बहुसु संतेसु ममादो एत्थ को महं माणो ।
को विब्भओ वि बहुसो पत्ते पुव्वम्मि उच्चत्ते॥1437॥
एधगसिु बहुसु संतसिु ममादाि एत्थ काि महं माणाि ।
काि ेवब्भआि ेव बहुसाि त्तिि िुव्वम्मि उच्चत्ति॥1437॥
अन्वयार्थ : धन से, ज्ञान से, कुल से, रूप से, ऐश्वर्य आदि में मेरे से अधिक श्रेष्ठ लोग जगत में बहुत विद्यमान हैं, इनका क्या मान? और पूर्व में अनेकबार पाकर छोडा तथा शुभकर्म के उदय से उच्चपना भी प्राप्त हुआ, इसमें क्या आश्चर्य है?

  सदासुखदासजी