जो अवमाणणकरणं दोसं परिहरइ णिच्चभाउत्तो ।
सो णाम होदि माणी ण दु गुणचत्तेण माणेण॥1438॥
पर को अपमानित करने का दोष तजे जो हो एकाग्र ।
वह ही मानी होता है गुण रहित मान से नहिं मानी॥1438॥
अन्वयार्थ : मानी तो वह पुरुष है, जो अपमान के कारणभूत दोष को नहीं करता । जो अपमान को बढाने वाला मानकषाय को करता है, वह काहे का मानी?

  सदासुखदासजी