
इह य परत्तय लोए दोसे बहुगे य आवहदि माणो ।
इदि अप्पणो गणित्ता माणस्स विणिग्गहं कुज्जा॥1439॥
इस भव एवं परभव में यह मान बहुत उपजाता दोष ।
यह विचार कर मान त्यागकर सभी भव्य होवें निर्दाेष॥1439॥
अन्वयार्थ : यह अभिमान इसलोक में तथा परलोक में अपने बहुत दोषों को बढाने वाला है । ऐसे मान की अवज्ञा/तिरस्कार करके, मान का निग्रह-त्याग करना योग्य है । ऐसे मानकृत दोष कहे ।
सदासुखदासजी