
अदिगूहिदा वि दोसा जणेण कालंतरेण णज्जंति ।
मायाए पउत्ताए को इत्थ गुणो हवदि लद्धो॥1440॥
छिप-छिपकर भी करें बुराई किन्तु बाद में सबको ज्ञात ।
हो जाता है, तो फिर मायाचारी करने से क्या लाभ॥1440॥
अन्वयार्थ : दोष को खूब अच्छी तरह से छिपाने पर भी वह समय पर लोकों में अवश्य प्रगट होता ही है तो छिपाकर क्या करेगा? इसलिए यहाँ की गई माया उससे तुझे क्या गुण प्रगट होंगे? कुछ भी गुण प्रगट नहीं होंगे, केवल तीव्र अशुभ कर्म का ही बंध होता है ।
सदासुखदासजी