पडिभोगम्मि असन्ते णियडिसहस्सेहिं गूहमाणस्स ।
चंदग्गहोव्व दोसो खणेण सो पायडो होइ॥1441॥
यदि प्रतिकूल भाग्य हो तो भी छल से कार्य करें छिपकर ।
क्षण भर में उद्घाटित होता जैसे होता चन्द्र-ग्रहण॥1441॥
अन्वयार्थ : किसी भाग्यहीन पुरुष के द्वारा दोष छिपा देने पर भी वे क्षणमात्र में चन्द्रमा के ग्रहण की तरह प्रगट होते हैं । जैसे राहु द्वारा चन्द्रमा को ग्रसित किया जाना यह क्या प्रगट नहीं होता? लोक में क्षणमात्र में प्रगट होता ही है । इस "पापी राहु के बिना चंद्रमा को कौन ग्रसेगा?" तैसे ही हजारों कपटों के द्वारा छिपाया गया दोष जगत में प्रगट होता ही है, कपट छिपा रह ही नहीं सकता ।

  सदासुखदासजी