
जणपायडो वि दोसो दोसोत्ति ण घेप्पए सभागस्स ।
जह समलत्ति ण घिप्पदि समलं वि जए तलायजलं॥1442॥
पुण्यवान का दोष प्रकट हो जग में किन्तु न होता मान्य ।
जैसे सर का मलिन नीर भी जग में मलिन न होता मान्य॥1442॥
अन्वयार्थ : भाग्यवान पुरुष का दोष प्रगट हो तो भी लोगों द्वारा वह ग्रहण नहीं किया जाता । दोष भी जगत को गुणरूप दिखते हैं । जैसे तालाब का मैला पानी "यह मलिन है" इस प्रकार लोगों द्वारा ग्रहण नहीं किया जाता । जब तक जल है, तब तक जल से भरा तालाब है, ऐसा जगत कहते हैं । उसमें मल भी भरा है, लेकिन जगतजन मल से भरा नहीं कहते हैं ।
सदासुखदासजी