डंभसएहिं बहुगेहिं सुपउत्तेहिं अपडिभोगस्स ।
हत्थं ण एदि अत्थो अण्णादो सपडिभोगादो॥1443॥
अच्छी तरह सैकड़ों छल से पुण्य-हीन यदि करे प्रयत्न ।
तो भी उसके हाथ नहीं आ सकता पुण्यवान का धन॥1443॥
अन्वयार्थ : बहुत यत्न करके जो बहुत-सा मायाचार किया है, उस भाग्यहीन व्यक्ति के पुण्यवान का धन हाथ नहीं लगता । मायाचार करने से केवल दुर्गति का कारण पापबंध ही होता है, लेकिन पुण्यहीन के हाथ पुण्यवान का धन नहीं लगता ।

  सदासुखदासजी