पं-सदासुखदासजी
इह य परत्तय लोए दोसे बहुए य आवहइ माया ।
इदि अप्पणो गणित्ता परिहरिदव्वा हवइ माया॥1444॥
इस भव एवं परभव में यह माया उपजाती बहु दोष ।
यह विचार कर माया तजकर सभी भव्य होवें निर्दाेष॥1444॥
अन्वयार्थ :
माया कषाय का पाँच गाथाओं में वर्णन किया ।
सदासुखदासजी