
सव्वे वि जए अत्था पिरगहिदा ते अणंतखुत्तो मे ।
अत्थेसु इत्थ को मज्झ विंभओ गहिदविजडेसु॥1446॥
सव्वि ेव जए अत्था ेरिगेहदा ति अणंतखुत्ताि मि ।
अत्थसिु इत्थ काि मज्झ ेवंभआि गेहदेवजडसिु॥1446॥
अन्वयार्थ : जगत में समस्त जाति के अर्थ/परिग्रह हैं । वे मैंने अनंतबार ग्रहण किये और अनंतबार प्राप्त करके छोडे, उनकी प्राप्ति में अब क्या आश्चर्य?
सदासुखदासजी