इह य परत्तय लोए दोसे बहुए य आवहइ लोभो ।
इदि अप्पणो गणित्ता णिज्जेदव्वो हवदि लोभो॥1447॥
इस भव एवं परभव में करता यह लोभ अरे बहुदोष ।
यह विचार कर लोभ त्यागकर सभी भव्य होवें निर्दाेष॥1447॥
अन्वयार्थ : लोभ इस लोक और परलोक में अनेक दोषों का उत्पादक है, इसलिए ज्ञान के प्रभाव से इसका नाश करके, लोभकषाय को जीतना योग्य है । ऐसा इन्द्रिय-कषाय का स्वरूप कहा ।

  सदासुखदासजी