
जदि अधिवाधिज्ज तुमं णिद्दा तो तं करेहि सज्झायं ।
सुहुमत्थे वा चिंतेहि सुणव संवेगणिव्वेगं॥1449॥
नींद सताती हो यदि तुमको तो हे भवि! स्वाध्याय करो ।
वस्तु स्वरूप विचारो संवेगी निर्वेदी, कथा सुनो॥1449॥
अन्वयार्थ : हे साधु! जब तुम्हें निद्रा बाधा पहुँचाती है, तब तुम स्वाध्याय का आश्रय लो और आगम के सूक्ष्म पदार्थे का चिंतवन करो तथा धर्मानुरागिणी संसार-देह-भोगों से विरक्त करने वाली संवेगिनी-निर्वेदिनी कथाओें को सुनो-पढो ।
सदासुखदासजी