को णाम णिरुव्वेगो लोगे मरणादि अग्गिपज्जलिदे ।
पज्जलिदम्मि व णाणी धरम्मि सोंदु अभिलसिज्ज॥1454॥
मरणादिक दुःख की ज्वाला में जलते घर-सम इस जग में ।
निश्चित होकर सोने की अभिलाषा ज्ञानी कौन करे॥1454॥
अन्वयार्थ : जैसे - जलते हुए गृह में कौन ज्ञानी - बुद्धिमान सोने की अभिलाषा करेगा? तैसे ही जन्म-मरणादि अग्नि से प्रज्वलित लोक में कौन ज्ञानी उद्वेग रहित होकर शयन करेगा? ज्ञानी को संसार का बहुत भय है, अचेत होकर शयन नहीं करते हैं, संसार-परिभ्रमण से आत्मा की रक्षा करने में सदैव सावधान रहते हैं ।

  सदासुखदासजी