को णाम णिरुव्वेगो सुविज्ज दोसे सु अणुवसंतेषु ।
गहिदाउहाण बहुयाण मज्झयारेव सत्तूणं॥1455॥
शस्त्र सुसज्जित शत्रु संग निर्भय होकर सो सकता कौन?
भववर्धक रागादिक को उपशान्त किये बिन सोये कौन॥1455॥
अन्वयार्थ : जैसे - ग्रहण किये हैं आयुध/शस्त्र जिनने, ऐसे बहुत-से शत्रुओं के मध्य कौन निर्भय होकर सोयेगा? तैसे ही आत्मघात करने वाले रागादि दोष को नष्ट किये बिना कौन ज्ञानी निर्भय होकर शयन करेगा? अर्थात् जागृत ही रहता है ।

  सदासुखदासजी