
णिद्दा तमस्स सरिसी अण्णो णत्थि हु तमो मणुस्साणं ।
इति णच्चा जिणसु तुमं णिद्दा ज्झाणस्स विग्घयरी॥1456॥
निद्रारूपी अन्धकार-सम और न कोई तम नर का ।
यह विचार कर अहो क्षपक ! तुम ध्यान-विघ्न जीतो निद्रा॥1456॥
अन्वयार्थ : मनुष्यों को निद्रारूप अंधकार के समान दूसरा अंधकार नहीं है । हे भव्य! ऐसा तू जान । ध्यान में विघ्न करने वाली निद्रा पर तुम विजय प्राप्त करो ।
सदासुखदासजी