
कुण वा णिद्दा मोक्खं णिद्दामोक्खस्स भणिदवेलाए ।
जह वा होइ समाही खवणकिलिंतस्स तह कुणह॥1457॥
आगम कथित समय निद्रा तजने का तब निद्रा त्यागो ।
उपवासादिक से क्वान्त क्षपक ! जैसे समाधि हो वही करो॥1457॥
अन्वयार्थ : हे भव्य! निद्रा त्यागने का समय - तीन प्रहर रात्रि व्यतीत हुए बाद निद्रा का त्याग करना । क्षपण अर्थात् उपवास करने में तुम्हें खेद-खिन्नता हो तो रत्नत्रयधर्म में तथा शुभध्यान में सावधानी रहे - ऐसा यत्न करना ।
सदासुखदासजी