+ अब जो आलस के कारण तप नहीं करते, उनके दोष दिखाते हैं - -
विरियंतरायमलसत्तणेण बंधदि चरित्तमोहं च ।
देहपडिबद्धदाए साधू सपरिग्गहो होइ॥1463॥
आलस से वीर्यान्तराय अरु चरित मोहनी कर्म बँधे ।
तन में आसक्ति रखने से उस मुनि को परिग्रही कहें॥1463॥
अन्वयार्थ : जो आलसी होकर शक्तिप्रमाण तप नहीं करता है, वह वीर्यान्तराय और चारित्रमोहनीय कर्म को बाँधता है और शरीर की आसक्ति से साधु - मुनि परिग्रहवान होता है, क्योंकि समस्त परिग्रह को शरीर के सुख के लिये ही ग्रहण करता है, इसलिए जो शारीरिक सुख में आसक्त है, वह समस्त परिग्रह में आसक्त है । जो शक्तिप्रमाण तप नहीं करता, अपनी शक्ति को छिपाता है, वह मायाचारी है । इससे उस साधु को माया कषाय जनित भी दोष लगता है, ऐसा कहते हैं -

  सदासुखदासजी