+ उस साधु को माया कषाय जनित भी दोष लगता है, ऐसा कहते हैं - -
मायादोसा मायाए हंुति सव्वे वि पुव्वणिद्दिट्ठा ।
धम्मम्मि णिप्पिवासस्स होइ सो दुल्लहो धम्मो॥1464॥
पूर्व कथित माया के दोष कहे हैं शक्ति छिपाने में ।
जिसे अनादर भाव धर्म में उसे धर्म फिर दुर्लभ है॥1464॥
अन्वयार्थ : जो शक्तिप्रमाण तप नहीं करता, वह तो मायाचारी हुआ । उस मायाचारी को मायाचार के जो दोष पहले कहे गये हैं, वे सब ही दोष लगते हैं और मायाचार से धर्म में निरादर करने वाले को संसार में उत्तमतप धर्म पाना अत्यंत दुर्लभ हो जाता है ।

  सदासुखदासजी