+ भावार्थ - जो धर्मसेवन में मायाचार करता है, वह धर्म का तिरस्कार करता है - -
पुव्वुत्ततवगुणाणं चुक्को जं तेण बंचिओ होइ ।
विरियणिगूही बंधदि मायं विरियंतरायं च॥1465॥
पूर्व कथित जो तप के गुण हैं तप-च्युत उनसे वंचित हो ।
शक्ति छिपाने से होता वीर्यान्तराय या माया बन्ध॥1465॥
अन्वयार्थ : जो शक्ति होते हुए भी तप नहीं करता है, वह पूर्व में कहे गये तपस्या से होने वाले संवर-निर्जरादि समस्त गुणों से रहित होता है । इस कारण स्वयं से स्वयं ही ठगाया गया है और अपने वीर्य/शक्ति, छिपाने वाले मायाचार कर्म तथा वीर्यांतराय कर्म का तीव्र बंधन करता है ।

  सदासुखदासजी