तवमकरिंतस्सेदे दोसा अण्णे य होंति संतस्स ।
होंति य गुणा अणेया सत्तीए तवं करेंतस्स॥1466॥
जो तप में तत्पर नहिं होते उनको होते हैं सब दोष ।
तप करनेवालों को होते हैं अनेक गुण जो निर्दाेष॥1466॥
अन्वयार्थ : जो साधुजन तप नहीं करते हैं, उनके अन्य भी दोष होते हैं और शक्तिप्रमाण तप करने वाले साधु के अनेक गुण होते हैं ।

  सदासुखदासजी