+ अब तपश्चरण के गुणों को दिखाते हैं - -
इह य परत्त य लोए अदिसय पूयाओ लहइ सुतवेण ।
आवज्जिज्जंति तहा देवा वि संइंदिया तवसा॥1467॥
इस भव अरु परभव में होती है अतिशय पूजा तप से ।
इन्द्रादिक सुरगण भी सारे विनयवन्त होते तप से॥1467॥
अन्वयार्थ : सम्यक्तप से इसलोक में तथा परलोक में अतिशय रूप पूजा को प्राप्त होते हैं तथा सच्चे तप से इन्द्रों सहित समस्त देवों द्वारा सेवनीय होते हैं ।

  सदासुखदासजी