संसार महाडाहेण डज्झमाणस्स होइ सीयघरं ।
सुतवोदाहेण जहा सीयघरं डज्झमाणस्स॥1471॥
तप संसार महाज्वाला में जलते नर को है जलधर ।
रवि-किरणों से जलते नर के लिए बरसता ज्यों बादल॥1471॥
अन्वयार्थ : जैसे ग्रीष्म ऋतु के संताप से संतप्त हुए जीवों के लिये शीतगृह/धारागृह/ फव्वारा गर्मी को दूर करने वाला होता है । तैसे ही संसार की महादाह से दग्ध/संतप्त जीवों के लिए सम्यक्तप शीतगृह/फुव्वारा है ।

  सदासुखदासजी