
णीयल्लओ व सुतवेण होइ लोगस्स सुप्पिओ पुरिसो ।
माया व होइ विस्ससणिज्जो सुतवेण लोगस्स॥1472॥
सम्यक् तप करनेवाला नर सबको प्रिय हो बन्धु समान ।
तप से ही विश्वास-पात्र नर सबको होता मात समान॥1472॥
अन्वयार्थ : सम्यक्तप को धारण करने वाला व्यक्ति लोक में अपने निजबंधु मित्र, पुत्र के समान अत्यन्त प्रिय होता है और सम्यक्तप करने वाला व्यक्ति समस्त लोक में अपनी माता समान विश्वास करने योग्य हो जाता है । अत: तपस्वी समस्त लोकों को प्रिय होता है तथा समस्त लोकों के विश्वास का पात्र होता है ।
सदासुखदासजी