कल्लाणिढ्ढिसुहाइं जावदियाइं हवे सुरणरणं ।
जं परमणिव्वुदिसुहं व ताणि सुतवेण लब्भंति॥1473॥
चक्री नारायण अरु सुर नर के सुख या पाँचों कल्याण ।
तथा परम सुख शिवपुर का भी सम्यक् तप से होता जान॥1473॥
अन्वयार्थ : पंचकल्याणक, अद्भुत ऋद्धि तथा देवों और मनुष्यों की जितनी विभूति होती है तथा सर्वोत्कृष्ट निर्वाण का सुख, सब ही सम्यक्तप से प्राप्त होता है ।

  सदासुखदासजी