
होइ सुतवो य दीओ अण्णाणतमंधयारचारिस्स ।
सव्वावत्थासु तओ वढ्ढदि य पिदा व पुरिसस्स॥1475॥
अज्ञान महातम में भटके नर को सम्यक् तप दीप-समान ।
सभी अवस्थाओं में हितकारी, नर को है यह पिता-समान॥1475॥
अन्वयार्थ : अज्ञानरूप अन्धकार में प्रवर्तन करने वाले जीवों को ज्ञानरूप उद्योत करने वाला यह सम्यक्तप दीपक समान है तथा समस्त अवस्थाओं में पुरुष का यह सम्यक्तप पिता समान रक्षक है । अवधिज्ञान, मन:पर्ययज्ञान, श्रुतकेवल/श्रुतज्ञान तथा केवलज्ञान तप ही से प्राप्त होते हैं । इस जीव की संसारपतन से रक्षा करने में समर्थ यह तप ही है ।
सदासुखदासजी