
फलिहो व दुग्गदीणं अणेयदुक्खावहाण होइ तवो ।
आमिसतण्हाछेदणसमत्थ मुदकं व होइ तवो॥1477॥
बहु दुःखदायी दुर्गतियों के लिए अर्गला-सम तप जान ।
विषय-तृषा को करे शान्त यह तप प्यासे को नीर-समान॥1477॥
अन्वयार्थ : एक यह तप ही जीव को दुर्गति में जाने से अर्गला समान रोकने वाला है जीव को दुर्गति में नहीं जाने देता है । कैसी है दुर्गति? अनेक दु:खों को देने वाली है । और सम्यक्तप विषयों की महातृष्णा को छेदने में समर्थ जल के समान है ।
सदासुखदासजी