मणदेहदुक्खवित्तासिदाण सरणं गदी य होइ तवो ।
होइ य तवो सुतित्थं सव्वासुहदोसमल हरणं॥1478॥
तन-मन दुःख से पीड़ित नर को शरण और गति तप ही है ।
अशुभ दोष-मल प्रक्षालन को तीर्थ-समान सुतप ही है॥1478॥
अन्वयार्थ : मानसिक दु:ख तथा शारीरिक दु:ख उनके त्रास को प्राप्त जीवों को सम्यक्तप ही शरण है । दु:खों से निकालने को तप ही गति है तथा समस्त पाप दोष रूप मल के हरने को - दूर करने को तप ही सत्य तीर्थ है । इस जीव के पाप हरने को तपरूपी तीर्थ बिना अन्य तीर्थ समर्थ नहीं हैं ।

  सदासुखदासजी