संसारविसमदुग्गे तवो पणट्ठस्स देसओ होदि ।
होइ तवो पच्छयणं भवकंतारम्मि दिग्घम्मि॥1479॥
विषम दुर्ग इस जग में भटके नर को तप उपदेशक है ।
दुर्गम भव-वन में भटके नर को पाथेय यही तप है॥1479॥
अन्वयार्थ : संसाररूप विषम दुर्गम वन में मार्ग भूलकर बहुत काल से परिभ्रमण करते हुए जीव को मोक्षमार्ग का उपदेश देकर संसारवन से निकालने वाला एक तप ही है और दीर्घ संसाररूप वन उसमें पथ्य भोजन भी तप ही है ।

  सदासुखदासजी