
रक्खा भएसु सुतवो अब्भुदयाणं च आगरो सुतवो ।
णिस्सेणी होइ तवो अक्खयसोक्खस्स मोक्खस्स॥1480॥
सम्यक् तप है भय से रक्षक और अभ्युदयों की है खान ।
अविनाशी सुखरूप, मुक्ति जाने को इसे नसैनी मान॥1480॥
अन्वयार्थ : भयों से रक्षा करने वाला एक तप ही है । समस्त देव-मनुष्य संबंधी अभ्युदय की खान एक तप ही है तथा अविनाशी सुख का ठिकाना जो मोक्ष उसकी नसैनी भी एक सम्यक्तप ही है ।
सदासुखदासजी