तं णत्थिं जं ण लब्भइ तवसा सम्मं कएण पुरिसस्स ।
अग्गीव तणं जलिओ कम्मतणं डहदि य तवग्गी॥1481॥
जग में एेसी वस्तु नहीं जो सम्यक् तप से प्राप्त न हो ।
जैसे अग्नि जलाती तृण, तप-अग्नि जलाती कमाब को॥1481॥
अन्वयार्थ : जगत में ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो सम्यक्तप द्वारा जीव को प्राप्त न हो । जैसे अग्नि तृणों को दग्ध करती है, तैसे ही तपरूपी अग्नि कर्मरूपी तृणों को दग्ध करती है ।

  सदासुखदासजी