
सम्मं कदस्स अपरिस्सवस्स ण फलं तवस्स वण्णेदु ।
कोई अत्थि समत्थो जस्स वि जिब्भासयसहस्सं॥1482॥
सम्यक् विधि से किये निरास्रव तप के फल के वर्णन में ।
जिसकी हों सहस्र जिह्वा वह भी समर्थ नहिं, कहने में॥1482॥
अन्वयार्थ : जिसके लाख जिह्वा हों, वह भी आस्रवरहित सच्चे तप के फल का वर्णन करने में समर्थ नहीं होता ।
सदासुखदासजी