
एवं णादूण तवं महागुणां संजमम्मि ठिच्चाणं ।
तवसा भावेदव्वा अप्पा णिच्चं पि जुत्तेण॥1483॥
संयम में स्थित जन तप को इसप्रकार उपकारी जान ।
तप की करें भावना अपने आतम में उपयोग लगा॥1483॥
अन्वयार्थ : ऐसे तप का महान गुण जानकर, संयम में स्थित रहकर और उपयुक्त तप के द्वारा आत्मा को नित्य ही भाना योग्य है ।
सदासुखदासजी