
जह गहिदवेयणो वि य अदयाकज्जे णिउज्जदे भिच्चो ।
तह चेव दमेयव्वो देहो मुणिणा तवगुणेसु॥1484॥
वेतन भोगी सेवक पर ज्यों दया न की जाती जग में ।
वैसे क्षपक लगायें तप में निज तन, दया न कर उसमें॥1484॥
अन्वयार्थ : जैसे अपने कार्य के लिये स्वामी, वेदना युक्त सेवक की भी दया न करके अपना कार्य आ जाये तो उसमें लगा देता है । तैसे ही मुनि भी देह का, तपरूपी गुणों से दमन करते हैं । ऐसे तप नामक उत्तरगुण का सत्ताईस गाथाओं में वर्णन किया ।
सदासुखदासजी