इच्चेव समणधम्मो कहिदो मे दसविहो सगुणदोसे ।
एत्थ तुममप्पमत्तो होहि समण्णागदसदीओ॥1485॥
इसप्रकार मुनि धर्म कहा है दस प्रकार गुण दोषों से ।
इसे जान अप्रमादी होकर दस धर्माराधना करो॥1485॥
अन्वयार्थ : अब संस्तर को प्राप्त हुए मुनि को निर्यापकाचार्य गुरु ऐसा उपदेश देते हुए कहते हैं - हे क्षपक! ऐसे गुण-दोषों से युक्त दश प्रकार का मुनिधर्म है, वह मैंने तुम्हें कहा । अब इस श्रमणधर्म में सावधान होकर, प्रमाद रहित हो धर्म में बुद्धि को लीन करना ।

  सदासुखदासजी