तो खवगवयणकमलं गणिरविणो तेहिें वयणरस्सीहिं ।
चित्तप्पसायविमलं पफुल्लिदं पीदिमयरंदं॥1486॥
सूरिसूर्य की वचनकिरण से मुनि-मुखकमल प्रफुल्लित हो ।
चित प्रसन्न होने पर उससे प्रीतिरूप मकरंद झरे॥1486॥
अन्वयार्थ : उन निर्यापकाचार्य गुरुओं के द्वारा शिक्षा दी जाने के पश्चात् निर्यापक आचार्य रूप सूर्य के द्वारा पहले कहे गये जो शिक्षा रूप वचन वे ही हैं किरणें, उससे क्षपक का मुखरूप कमल प्रफुल्लित होता है । कैसा है मुखकमल? आचार्य के शिक्षाप्रद वचनों में जो प्रीति, वही उसमें सुगंध है । और कैसा है मुखकमल? चित्त को प्रसन्न करके निर्मल हुआ है ।

  सदासुखदासजी