वयणकमलेहिं गणिअभिमुहेहिं सावत्थिदत्थिपत्तेहिं ।
सोभदि सभा सूरोदयम्मि फुल्लं व णलिणिवणं॥1487॥
सूर्याेदय होने पर खिले कमल से विपिन सुशोभित हो ।
विस्मित नयन-पत्रयुत मुख-कमलों से सभी सुशोभित त्यों॥1487॥
अन्वयार्थ : इस जगत में सूर्य का उदय होते ही जैसे प्रफुल्लित कमलों का वन शोभता है, तैसे ही आचार्य के उपदेशामृत को सुनकर आश्चर्य रूप हैं नेत्र पत्र जिसमें, ऐसे आचार्य के सन्मुख जो मुखरूप कमल उससे क्षपक भी शोभता है ।

  सदासुखदासजी