
मणिउवएसामयपाणएण पल्हादिदम्मि चित्तम्मि ।
जाओ य णिव्वुदो सो पादूणय पाणयं तिसिओ॥1488॥
जैसे प्यासा अमृत-मय पानक पीकर होता है तृप्त ।
गणि उपदेशामृत पीकर त्यों चित प्रसन्न हो सुखी क्षपक्॥1488॥
अन्वयार्थ : जैसे कोई बहुत समय का प्यास से पीडित व्यक्ति अमृतमय जलपान करके तृप्त होता है, तैसे ही क्षपक मुनि भी आचार्य द्वारा प्रदत्त उपदेशामृत को पीकर, आनंद-चित्त होकर सुख को प्राप्त होता है ।
सदासुखदासजी