
तो सो खवओ तं अणुसट्ठिं सोऊण जाद संवेगो ।
उढ्ढित्ता आयरियं वंदइ विणएण पणदंगो॥1489॥
सुनकर गणि उपदेश क्षपक वैराग्य भाव से भर जाता ।
उठकर अंग नमाकर विनय सहित गणि को वन्दन करता॥1489॥
अन्वयार्थ : तदनंतर गुरुओं की शिक्षा सुनकर उत्पन्न हुआ है परमधर्म में अनुराग जिसके, ऐसा क्षपक मुनि भी संस्तर से उठकर और विनय से नम्रीभूत है सर्वांग जिनका, वे आचार्यदेव वन्दना करते हैं ।
सदासुखदासजी