
भंते सम्मं णाणं सिरसा य पडिच्छिदं मए एदं ।
जं जह उत्तं तं तह काहेत्ति य सो तदो भणइ॥1490॥
दिया आपके द्वारा सम्यग्ज्ञान प्रभो! स्वीकार करूँ ।
जैसा जो भी कहा आपने वही करूँ उर-शीश धरूँ॥1490॥
अन्वयार्थ : वन्दना करने के बाद क्षपक गुरुजनों से विनती करते हैं - हे भगवन्! मैंने आप का दिया गया सम्यग्ज्ञान मस्तक चढाकर अंगीकार किया । अब आप जैसी आज्ञा करेंगे, उसी प्रकार मैं प्रवर्तन करूंगा । इस प्रकार नम्रीभूत होकर विनयपूर्वक श्री गुरुजनों के चरणारविन्दों के सन्मुख होकर विनती करते हैं ।
सदासुखदासजी