जह अप्पणो गणस्य य संघस्स य विस्सुदा हवदिकित्ती ।
संघस्स पसायेण य तहहं आराहइस्सामि॥1492॥
जैसे मेरी और संघ की कीर्ति व्याप्त हो त्रिभुवन में ।
संघ कृपा से उस प्रकार से रत्नत्रय आराधँू मैं॥1492॥
अन्वयार्थ : क्षपक श्री गुरुओं से विनती करते हैं - हे भगवन्! मेरा आत्मा जैसे संसार से निस्तीर्णता/पार हो जाये! जिस प्रकार आप को परम सन्तोष हो । और जैसे मेरे अनुग्रह में प्रवर्तन करने वाले समस्त संघ का परिश्रम सफल हो, मेरी तथा आपकी/आचार्य की और सकल संघ की उज्ज्वल कीर्ति जगत में विख्यात हो, उसी प्रकार संघ के प्रसाद से आराधना ग्रहण करूँगा ।

  सदासुखदासजी