
धीरपुरिसेहिं जं आयरियं जं च ण तरंति कापुरिसा ।
मणसा वि विचिंतेदु तमहं आराहणं काहं॥1493॥
वीर पुरुष कर सकें आचरण किन्तु का-पुरुष कभी नहीं ।
मन में नहिं कर सकें कल्पना एेसी आराधना करूँ ॥1493॥
अन्वयार्थ : जो आराधना गणधरादि वीर पुरुषों ने आराधी है, जिस आराधना को विषयों के लंपटी तथा तीव्र कषाय के धारक कायर पुरुष मन से भी चिंतवन करने में समर्थ नहीं, उस आराधना को मैं आपके प्रसाद से आराधूँगा ।
सदासुखदासजी