
किं जंपिएण बहुणा देवा वि सइंदिया महं विग्घं ।
तुम्हं पादोवग्गहगुणेण कादुं ण तरिहंति॥1495॥
अधिक क्या कहूँ प्रभो! आपके पद-पंकज के अनुग्रह से ।
सुरपति भी कर सके न मेरी आराधन में विघ्न अरे॥1495॥
अन्वयार्थ : हे भगवन्! अधिक कहने से क्या? आपके चरणों के उपकाररूप गुणों से मेरी आराधना में विघ्न करने को इन्द्रों सहित देव भी समर्थ नहीं हैं तो अन्य विषय-कषाय युक्त पुरुषों की तो क्या सामर्थ्य ।
सदासुखदासजी