
किं पुण छुहा व तण्हा परिस्समो वादियादि रोगो व ।
काहिंतिज्झाणविग्घं इंदियविसया कसाया वा॥1496॥
तो फिर भूख प्यास अरु परिश्रम वातादिक सब रोग अरे ।
अथवा विषय-कषाय ध्यान में कैसे मुझको विघ्न करें॥1496॥
अन्वयार्थ : जब इन्द्रों सहित देवता भी हमारी आराधना में विघ्न नहीं कर सकते, तब क्या क्षुधा, तृषा परीषह, वात, पित्त, कफादि रोग, इन्द्रियों के विषय तथा क्रोधादि कषायें हमारे ध्यान में विघ्न कर सकते हैं? अपितु कुछ भी नहीं कर सकते हैं ।
सदासुखदासजी