ठाणा चलेज्ज मेरु भूमी ओमच्छिया भविस्सिहिदि ।
ण य हं गच्छामि विगदिं तुज्झं पायप्पसाएण॥1497॥
सुरगिरि भी विचलित हो जाये अथवा पृथिवी भी उल्टे ।
किन्तु आपके अनुग्रह से मैं, विचलित हो न सकूँ पथ से॥1497॥
अन्वयार्थ : हे गुरुवर! हे प्रभो! कदाचित् सुमेरु पर्वत अपने स्थान से चलायमान हो जाये, तथा पृथ्वी उलटी - औंधी हो जाये, किन्तु आपके/श्री गुरु के चरणारविंदों के प्रसाद से मैं विकार को प्राप्त नहीं होऊँगा - आराधना से चलायमान नहीं होऊँगा ।

  सदासुखदासजी