एवं खवओ संथारगओ खवइ विरियं अगूहंतो ।
देदि गणी वि सदा से तह अणुसठ्ठिं अपरिदंतो॥1498॥
इसप्रकार संस्तर आरूढ़ क्षपक निज शक्ति छिपाए बिना ।
कर्म निर्जरा करे, गणी भी दे उपदेश विरक्ति बिना॥1498॥
अन्वयार्थ : ऐसे संस्तर को प्राप्त हुए जो क्षपक अपनी शक्ति को नहीं छिपाते हुए कर्म को खिपाते - क्षय करते हैंऔर आचार्य भी आलसरहित होकर जैसे क्षपक का ज्ञान जागृत रहे, तैसे सदाकाल परम धर्म की शिक्षा देते हैं ।

  सदासुखदासजी