
अकडुगमतित्तयमणं विलंब अकसायमलवणं मधुरं ।
अविरस मदुव्विगंधं अच्छमणुण्हं अणदिसादं॥1499॥
पाणगमसिंभलं परिपूयं खीणस्स तस्स दायव्वं ।
जह वा पच्छं खवयस्स तस्स तह होइ दादव्वं॥1500॥
कटुक चरपरा खट्टा और कसैला नमकयुक्त मीठा ।
नीरस अरु दुर्गन्धित नहिं हो स्वच्छ रहे, न गरम ठंडा॥1499॥
कफ नाशक अरु पथ्यरूप हो कपड़े से भी छना हुआ ।
पानक देय क्षपक को एेसा जो समाधि का हो साधन॥1500॥
अन्वयार्थ : समाधिमरण की प्रतिज्ञा करके क्षीणकाय क्षपक के लिये पानक/पीने योग्य आहार ऐसा देना योग्य है, जो क्षपक को पथ्यरूप हो, परिपाक काल में गुणकारक हो, शरीर के रोगों को उपशम/शमन करे, ऐसा पीने योग्य आहार देने योग्य है । जो कटुक/कडवा न हो और बहुत चिरपरा न हो, खट्टा न हो, कषायला न हो, नमकरहित हो तथा मीठा न हो, शक्कर, मिश्री इत्यादि की मिलावट न हो तथा विरस जो स्वादरहित न हो, दुर्गंध वाला न हो, स्वच्छ हो, गर्म न हो, अति ठंडा भी न हो, कफ उत्पादक न हो और पवित्र हो - ऐसा जलादि पानक द्रव्य क्षपक को देने योग्य है ।
सदासुखदासजी